पालघर (महाराष्ट्र): जिला पालघर के ‘टेन’ गांव में स्थित पानी से भरी खदान एक बार फिर दो मासूमों के लिए ‘मौत का कुआं’ साबित हुई है। २७ फरवरी २०२६ को मध्य प्रदेश के रहने वाले दो प्रवासी बच्चों, जिग्नेश पवार (८ वर्ष) और आयुष पवार (१५ वर्ष) की डूबने से मौत हो गई। NDRF ने दो दिनों के सर्च ऑपरेशन के बाद दोनों शव बरामद कर लिए हैं, लेकिन इस घटना ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर साल का वही मातम: हादसा नहीं, यह प्रशासनिक हत्या है!
स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है क्योंकि यह कोई पहली घटना नहीं है। रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले साल और उसके पिछले साल भी इसी खदान में मासूमों की जान गई थी। हर साल यहाँ मातम पसरता है, चिताएं जलती हैं, लेकिन प्रशासन की नींद नहीं टूटती।
सीधे सवाल जो जवाब मांगते हैं:
1. सुरक्षा घेरा (Fencing) क्यों नहीं? यदि यह खदान बार-बार मौतों का केंद्र बन रही है, तो इसके चारों ओर कटीले तार या सुरक्षा दीवार क्यों नहीं बनाई गई?
2. चेतावनी बोर्ड का अभाव: क्या यहाँ कोई बोर्ड लगाया गया है जो लोगों को इस जानलेवा गहराई के बारे में सचेत करे?
3. खदान मालिक पर कार्रवाई कब? पिछले सालों में हुई मौतों के बाद भी इस असुरक्षित खदान को खुला छोड़ने के लिए जिम्मेदार लोगों पर अब तक FIR क्यों नहीं हुई?
गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं?
मृतक बच्चे मध्य प्रदेश के एक अत्यंत गरीब परिवार से थे, जो पालघर में प्लास्टिक चुनकर अपना पेट पालते थे। अक्सर इन प्रवासी परिवारों के पास बच्चों के खेलने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं होती, जिससे वे इन खतरनाक खदानों की ओर चले जाते हैं। क्या इन बच्चों की जान की कीमत सिर्फ इसलिए कम है क्योंकि वे गरीब और प्रवासी हैं?
अब आर-पार की लड़ाई: समाधान या इस्तीफा!
प्रशासन की भूमिका केवल घटना के बाद शव निकालने (NDRF बुलाने) तक सीमित रह गई है। स्थानीय जनता अब खोखले आश्वासनों से थक चुकी है। मांग सीधी और स्पष्ट है:
1. इस जानलेवा खदान को तुरंत मिट्टी डालकर भरा जाए या इसके चारों ओर पक्की सुरक्षा दीवार बनाई जाए।
2. पीड़ित गरीब प्रवासी परिवार को तुरंत उचित आर्थिक सहायता (मुआवजा) दी जाए।
3. लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और संबंधित विभाग पर सख्त कार्रवाई हो।
जब तक इस ‘मौत के जाल’ को बंद नहीं किया जाता, तब तक प्रशासन के हाथ इन मासूमों के खून से रंगे रहेंगे। अब देखना यह है कि जिला कलेक्टर और स्थानीय तहसीलदार इस बार भी सिर्फ ‘जांच‘ का नाटक करते हैं या कोई ठोस कदम उठाते हैं।
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