पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) के अध्यक्ष एच.डी. देवेगौड़ा ने बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे के संसद में किए गए मज़ाकिया टिप्पणी का करारा जवाब दिया। खर्गे ने संसद में हंसी-मज़ाक के अंदाज में कहा था कि देवेगौड़ा विपक्ष के साथ “प्रेम” रखना चाहते हैं, लेकिन बीजेपी के साथ विवाह करना चाहते हैं। खर्गे की इस बात ने पूरे हाउस को हंसी में डुबो दिया, और प्रधानमंत्री भी मुस्कुराते दिखाई दिए। देवेगौड़ा ने इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अगर विवाह की भाषा में बात करें, तो उनका कांग्रेस के साथ रिश्ता ज़बरदस्ती का था और उन्होंने उसे छोड़ना पड़ा क्योंकि वह रिश्ता अत्याचारी था।

हेडिंग 2: देवेगौड़ा ने ट्विटर पर जताई नाराज़गी
देवेगौड़ा ने खर्गे के बयान का जवाब सीधे X (पूर्व ट्विटर) पर देते हुए लिखा कि उनका कांग्रेस के साथ विवाह “जबरदस्ती” का था और उन्होंने इसे समाप्त करना पड़ा। उन्होंने साफ किया कि वे उस समय संसद में मौजूद नहीं थे क्योंकि वे उगाड़ी समारोह के लिए बेंगलुरु गए हुए थे। देवेगौड़ा का कहना था कि उनके लिए यह गठबंधन अब स्थिर नहीं रह गया था और उन्हें मजबूरन इसे खत्म करना पड़ा। उन्होंने अपनी बात में यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने कांग्रेस को छोड़ने का फैसला नहीं किया बल्कि कांग्रेस नेताओं ने खुद ही गठबंधन से दूरी बना ली।
हेडिंग 3: कांग्रेस पर गंभीर आरोप
2019 में JD(S)-कांग्रेस गठबंधन सरकार के पतन का हवाला देते हुए देवेगौड़ा ने कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जिन्होंने विधायकों को BJP में भेजा। देवेगौड़ा ने स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ यह गठबंधन टूटने का कारण नहीं था, बल्कि कांग्रेस नेताओं की हरकतों के कारण उन्हें मजबूरन अलग होना पड़ा। उन्होंने कहा, “अब सभी जानते हैं कि कितने कांग्रेस विधायक बीजेपी में गए और किसने उन्हें वहां भेजा।” देवेगौड़ा ने यह भी कहा कि उन्होंने एक स्थिर और भरोसेमंद गठबंधन की तलाश की।
हेडिंग 4: राजनीतिक गठबंधन और भविष्य की राह
देवेगौड़ा की इस प्रतिक्रिया से साफ हो गया है कि राजनीतिक गठबंधन में स्थायित्व और भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि जब पार्टनर अस्थिर और भरोसेमंद नहीं होते तो मजबूरी में ही अलग होना पड़ता है। देवेगौड़ा ने अपने ट्वीट में यह भी संकेत दिया कि आगे वह ऐसे गठबंधन की तलाश करेंगे जो अधिक स्थिर और भरोसेमंद हो। इस विवाद ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन कितने समय तक टिक सकते हैं और नेताओं के बीच भरोसा कितना अहम होता है।








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