औद्योगिक विकास और तकनीक की अंधी दौड़ में मानव सभ्यता ने प्राकृतिक संतुलन को गंभीर संकट में डाल दिया है। कंक्रीट के जंगलों के विस्तार और बेलगाम दोहन के कारण आज जलवायु परिवर्तन, असमय सूखा, अतिवृष्टि और जैव विविधता का ह्रास वैश्विक समस्या बन चुका है। प्रकृति केवल संसाधनों का स्रोत नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता का मूल आधार है।
आज कारखानों और वाहनों से निकलने वाले धुएं व रसायनों ने वायु और जल को प्रदूषित कर पारिस्थितिकी तंत्र को भारी क्षति पहुंचाई है। इसके साथ ही शहरीकरण और अवसंरचना परियोजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास लगातार नष्ट हो रहा है। जलस्रोतों के क्षरण और अत्यधिक प्लास्टिक उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति तथा तापमान नियंत्रण तंत्र भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
इस संकट से उबरने के लिए कोयला और पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाकर सौर, पवन और जल विद्युत जैसी हरित ऊर्जा को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है। इसके साथ ही केवल पौधरोपण तक सीमित न रहकर पौधों की सुरक्षा और स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण की ठोस नीति बनानी होगी। औद्योगिक स्तर पर शून्य-उत्सर्जन मानक लागू करने के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन में भी प्लास्टिक का त्याग, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन को अपनाना आवश्यक है।
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही मानव जाति के सुरक्षित भविष्य की एकमात्र गारंटी है। विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने में की गई कोई भी देरी आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी, इसलिए अब संरक्षण के संकल्पों को ठोस नीतियों और जमीनी कार्यों में बदलना ही एकमात्र विकल्प है।





