ओडिशा के गंजाम जिले स्थित ऋषिकुल्या समुद्र तट पर बुधवार सुबह ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हर किसी का दिल जीत लिया। हजारों की संख्या में ऑलिव रिडले कछुओं के नवजात शावक अपने घोंसलों से बाहर निकलकर बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ते नजर आए। समुद्र किनारे रेत पर एक साथ रेंगते इन छोटे-छोटे कछुओं का दृश्य बेहद मनमोहक और भावुक करने वाला था। हर साल यह प्राकृतिक घटना बड़ी संख्या में लोगों और पर्यावरण प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। वन विभाग के अधिकारी लगातार इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी भी तरह से शावकों को नुकसान न पहुंचे। विशेषज्ञों के मुताबिक अंडों से बाहर निकलने के बाद इन शावकों की समुद्र तक की यात्रा उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण चरण होता है। यही वह समय होता है जब प्रकृति उन्हें जीवित रहने की पहली परीक्षा से गुजराती है।

जीवन चक्र का सबसे अहम पड़ाव
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि ऑलिव रिडले कछुओं का यह सामूहिक समुद्र की ओर बढ़ना उनके जीवन चक्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। जैसे ही अंडों से शावक बाहर निकलते हैं वे स्वाभाविक रूप से समुद्र की दिशा में बढ़ने लगते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह उनकी जैविक प्रवृत्ति का हिस्सा है। गंजाम जिले का ऋषिकुल्या तट ओडिशा में ऑलिव रिडले कछुओं के सबसे प्रमुख प्रजनन स्थलों में शामिल है। इसके अलावा केंद्रपड़ा जिले का गाहिरमाथा तट और पुरी जिले का देवी नदी मुहाना क्षेत्र भी इन दुर्लभ समुद्री जीवों के सामूहिक अंडोत्सर्जन के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। हर साल लाखों कछुए यहां आकर अंडे देते हैं और फिर कुछ सप्ताह बाद यही शावक समुद्र की ओर लौटते दिखाई देते हैं। यह पूरा चक्र समुद्री पारिस्थितिकी का बेहद अहम हिस्सा माना जाता है।
इस बार कम हुआ अंडोत्सर्जन
हालांकि इस वर्ष ऑलिव रिडले कछुओं की संख्या में काफी कमी दर्ज की गई है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस बार ऋषिकुल्या तट पर करीब दो लाख कछुओं ने अंडे दिए जबकि पिछले वर्ष दो चरणों में लगभग नौ लाख कछुओं का अंडोत्सर्जन दर्ज किया गया था। जानकारी के अनुसार इस साल 15 मार्च से कछुओं का तट पर पहुंचना शुरू हुआ था। पहले दिन लगभग आठ हजार से दस हजार कछुओं ने सामूहिक रूप से अंडे दिए लेकिन यह प्रक्रिया केवल चार दिनों तक ही जारी रह सकी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मौसम और पर्यावरणीय बदलावों का बड़ा असर देखने को मिला। दक्षिणी हवाओं में देरी समुद्र तट का कटाव मौसम में असामान्य बदलाव और अंडोत्सर्जन के दौरान हुई बारिश ने इस प्रक्रिया को प्रभावित किया। इसके अलावा यह संभावना भी जताई जा रही है कि कई कछुओं ने इस बार दूसरे तटीय इलाकों को प्रजनन स्थल के रूप में चुना हो सकता है।
ओडिशा अब भी बना हुआ है सबसे बड़ा आश्रय
संख्या में गिरावट के बावजूद ओडिशा आज भी ऑलिव रिडले कछुओं के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण आवासों में गिना जाता है। खास तौर पर केंद्रपड़ा जिले का गाहिरमाथा समुद्र तट विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात ऑलिव रिडले प्रजनन स्थल माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ओडिशा के समुद्री तट इन कछुओं के संरक्षण के लिए बेहद जरूरी हैं और यहां की जैव विविधता पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। पर्यावरणविदों ने सरकार और स्थानीय प्रशासन से समुद्री तटों के संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर और ज्यादा ध्यान देने की मांग की है ताकि आने वाले वर्षों में ऑलिव रिडले कछुओं की संख्या दोबारा बढ़ सके। ऋषिकुल्या तट पर हजारों शावकों का समुद्र की ओर लौटना सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि यह प्रकृति और जीवन के अद्भुत संतुलन का संदेश भी है।





