मुंबई, दिनांक १५: जापानी इंसेफेलाइटिस (जापानी मस्तिष्क ज्वर) जैसी संक्रामक बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए निवारक उपायों, टीकाकरण और जन जागरूकता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जानकारी दी कि राज्य सरकार जापानी इंसेफेलाइटिस को नियंत्रित करने के लिए सतर्क है और टीकाकरण अभियान को गति दी जा रही है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को समन्वय के साथ काम करके इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाना आवश्यक है। वर्ष २०१५-१६ के दौरान देश के अन्य राज्यों में जापानी इंसेफेलाइटिस के खिलाफ टीकाकरण अभियान शुरू हुआ था। इसी दौरान विदर्भ के कुछ जिलों में इसके मरीज पाए गए थे। हालांकि, महाराष्ट्र में इसकी शुरुआत नहीं हुई थी। यह बात तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के संज्ञान में आई। उन्होंने उस समय केंद्र सरकार से विशेष अनुरोध किया और राज्य में जापानी इंसेफेलाइटिस टीकाकरण अभियान की शुरुआत की। इन प्रयासों के कारण आज मरीजों की संख्या लगभग शून्य पर आ गई है।
जापानी इंसेफेलाइटिस की विशेषताएं और खतरा
महाराष्ट्र में जापानी इंसेफेलाइटिस को लेकर स्वास्थ्य तंत्र सतर्क हो गया है और टीकाकरण व नियंत्रण उपायों को तेज कर दिया गया है। यह बीमारी मुख्य रूप से मच्छरों के माध्यम से फैलती है और मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जिससे गंभीर जटिलताएं, दौरे और मृत्यु की संभावना बनी रहती है। इस बीमारी की मृत्यु दर अधिक है और जीवित बचे मरीजों में न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र संबंधी) समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
राज्य की वर्तमान स्थिति
राज्य में २०२१ से मार्च २०२६ की अवधि के दौरान मरीजों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम रही है, लेकिन कुछ जिलों में मामले सामने आए हैं। २०२२ में २ मरीज, २०२३ में ५ मरीज, २०२४ में ५ मरीज व २ मौतें, २०२५ में ७ मरीज व १ मौत दर्ज की गई, जबकि २०२६ के मार्च तक एक भी मरीज नहीं मिला है। मुख्य रूप से विदर्भ के नागपुर, भंडारा, चंद्रपूर और गढ़चिरौली जिलों में मरीज पाए गए हैं।
टीकाकरण अभियान की प्रगति
अप्रैल २०२५ से फरवरी २०२६ के बीच टीकाकरण अभियान में राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। पहली खुराक का कुल कवरेज ८९.२६ प्रतिशत और दूसरी खुराक का ७८.६८ प्रतिशत है। धाराशिव (९९.५९%), लातूर (९७.८४%) और सोलापूर (९५% से अधिक) जिलों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। हालांकि, रायगढ़ में पहली खुराक ५५% व दूसरी खुराक ४८% रही है, जबकि पुणे और पीसीएमसी (PCMC) क्षेत्रों में दूसरी खुराक का प्रमाण तुलनात्मक रूप से कम पाया गया है।
निदान और उपचार सुविधाएं
राज्य में जापानी इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए नागपुर, गढ़चिरौली, सेवाग्राम (वर्धा), भंडारा और गोंदिया में पांच ‘सेंटिनल केंद्र’ कार्यरत हैं। साथ ही, १६ जिलों में बाल गहन चिकित्सा इकाई (PICU) शुरू की गई है, जहाँ मरीजों को आवश्यक उपचार सुविधाएं उपलब्ध हैं।
विदर्भ क्षेत्र सर्वाधिक संवेदनशील
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, विदर्भ जापानी इंसेफेलाइटिस के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में मच्छरों की वृद्धि, साथ ही सूअरों और पक्षियों के संपर्क के कारण संक्रमण का खतरा अधिक होता है। कुछ शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में भी महामारी का खतरा बना रहता है।
नियंत्रण के लिए व्यापक उपाय
राज्य में नियमित टीकाकरण, विशेष अभियान, रक्त के नमूनों की जांच, मच्छर नियंत्रण के लिए धूमीकरण (फॉगिंग), क्यूलेक्स मच्छरों का सर्वेक्षण, जन जागरूकता, मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर गप्पी मछलियाँ छोड़ना और स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं।
जनता से अपील
स्वास्थ्य विभाग ने अपील की है कि चूंकि जापानी इंसेफेलाइटिस विशेष रूप से बच्चों के लिए खतरनाक है, इसलिए नागरिक टीकाकरण करवाएं, मच्छरों से बचाव करें और बुखार या मस्तिष्क से संबंधित लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सा सलाह लें।








