Noida की सड़कों पर हर सुबह एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती है जहां हजारों दिहाड़ी मजदूर काम की तलाश में खड़े दिखाई देते हैं। सेक्टर 55, खोड़ा चौक, ममूरा चौक और सेक्टर 63 से 65 तक फैक्ट्रियों की ओर जाने वाले ये मजदूर अपने भविष्य की उम्मीदों के साथ घर से निकलते हैं। साइकिलों का रेला, शेयर ऑटो और पैदल चलते लोग इस औद्योगिक शहर की असली रीढ़ बन चुके हैं। लेकिन दिनभर की मेहनत के बाद भी इनकी जिंदगी में स्थिरता नहीं है और वे सिर्फ न्यूनतम मजदूरी पर गुजारा करने को मजबूर हैं।

कम वेतन और बिना सुरक्षा के काम की हकीकत
इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर 10 से 12 घंटे की ड्यूटी करते हैं लेकिन उन्हें केवल 10 से 12 हजार रुपये तक ही वेतन मिलता है। कई वर्षों से काम करने के बावजूद उन्हें अकुशल मजदूर ही माना जाता है और प्रमोशन या वेतन वृद्धि की कोई व्यवस्था नहीं है। भले ही कागजों में PF और ESI जैसी सुविधाएं दर्ज हों लेकिन वास्तविकता यह है कि न तो वेतन स्लिप मिलती है और न ही बीमा कार्ड उपलब्ध होता है। इससे मजदूरों की कानूनी सुरक्षा पूरी तरह कमजोर हो जाती है और वे किसी भी शिकायत के लिए ठोस आधार नहीं बना पाते।
खोड़ा और आसपास की बस्तियों की कठिन जीवन स्थिति
Khoda Colony में रहने वाले मजदूरों की स्थिति और भी कठिन है। यहां की तंग गलियों में रहने वाले परिवारों की आय और खर्च के बीच भारी असंतुलन है। किराया, गैस, बिजली, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्च मजदूरी से कहीं अधिक हो जाते हैं। कई परिवारों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अतिरिक्त काम करना पड़ता है जैसे कि घरेलू काम या छोटी मोटी मजदूरी। इसके बावजूद महीने के अंत में बचत लगभग शून्य रह जाती है और जीवन आर्थिक दबाव में चलता रहता है।
सिस्टम और सरकारी ढांचे पर गंभीर सवाल
मजदूरों का कहना है कि लेबर विभाग और निरीक्षण व्यवस्था केवल कागजों में सीमित है जबकि वास्तविकता में कोई निगरानी नहीं होती। ठेकेदार व्यवस्था के कारण कई मजदूरों को न तो सैलरी स्लिप मिलती है और न ही सही वेतन का रिकॉर्ड होता है। Ghaziabad जाना भी उनके लिए कठिन है क्योंकि एक दिन की मजदूरी का नुकसान उन्हें सरकारी कामों से दूर रखता है। यही कारण है कि लाखों मजदूर आज भी मूलभूत सुविधाओं और अधिकारों से वंचित जीवन जी रहे हैं। यह स्थिति पूरे औद्योगिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है और सुधार की आवश्यकता को उजागर करती है।







