पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। बीजेपी ने 200 से अधिक सीटें जीतकर राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बढ़त हासिल कर ली है। वहीं सबसे चौंकाने वाला परिणाम यह रहा कि खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं। इस हार ने न सिर्फ टीएमसी खेमे में हलचल मचा दी है बल्कि पूरे राज्य की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। इसे बीजेपी की रणनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है जिसमें संगठन और स्थानीय मैनेजमेंट की अहम भूमिका रही।

भवानीपुर सीट पर जातीय समीकरण ने बदला खेल
भवानीपुर सीट लंबे समय से ममता बनर्जी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन इस बार यहां राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। यह क्षेत्र बहुस्तरीय सामाजिक संरचना वाला है जहां पारंपरिक बंगाली मतदाताओं के साथ-साथ मारवाड़ी और गुजराती व्यापारिक समुदाय भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बीजेपी ने इसी सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाई और वोट बैंक को साधने में सफलता हासिल की। यही वजह रही कि ममता बनर्जी को इस बार अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा।
राजेंद्र राठौड़ की रणनीति बनी गेमचेंजर
सूत्रों के अनुसार राजस्थान के वरिष्ठ बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ को भवानीपुर सीट की रणनीतिक जिम्मेदारी दी गई थी। उनकी चुनावी योजना ने पूरे मुकाबले को अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया। बूथ स्तर पर मजबूत संगठन, वोटरों से सीधा संवाद और कमजोर क्षेत्रों में विशेष फोकस ने बीजेपी के पक्ष में माहौल तैयार किया। सुवेंदु अधिकारी ने भी चुनाव के बाद राजेंद्र राठौड़ की रणनीति की खुले मंच से सराहना की और कहा कि उनके नेतृत्व में चुनावी अभियान बेहद प्रभावी रहा।
बूथ मैनेजमेंट और ग्राउंड कैम्पेनिंग ने किया बड़ा बदलाव
बीजेपी की जीत के पीछे सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत बूथ लेवल मैनेजमेंट और लगातार चलाया गया डोर टू डोर अभियान रहा। कार्यकर्ताओं की सक्रिय फौज ने हर बूथ पर पहुंचकर वोटरों से संपर्क साधा। खुद राजेंद्र राठौड़ भी कई बार ग्राउंड पर प्रचार करते नजर आए। इसी संगठित प्रयास का नतीजा रहा कि लंबे समय से टीएमसी के कब्जे वाली सीट भी बीजेपी के खाते में चली गई और ममता बनर्जी को करारी हार का सामना करना पड़ा।








