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मध्य प्रदेश भोजशाला मामले में ऐतिहासिक और धार्मिक दावों पर बढ़ा विवाद

By Neha
On: Saturday, May 16, 2026 7:43 AM
मध्य प्रदेश भोजशाला मामले में ऐतिहासिक और धार्मिक दावों पर बढ़ा विवाद
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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोजशाला विवाद पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि न्यायालय ने यह माना है कि इस स्थान का संबंध राजा भोज और मां वाग्देवी से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह स्थल भारतीय संस्कृति और शिक्षा परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इसके गौरव को पुनः स्थापित करने के प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि विदेश से वाग्देवी की प्रतिमा लाने की प्रक्रिया को विधि सम्मत तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा ताकि ऐतिहासिक पहचान को फिर से स्थापित किया जा सके।

न्यायालय के निर्णय को लेकर सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने इस निर्णय को भारतीय सांस्कृतिक चेतना और सनातन परंपरा की पुष्टि बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला ऐतिहासिक साक्ष्यों और पुरातात्विक जांच के आधार पर दिया गया है जिसमें एएसआई की रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना गया है। उनके अनुसार भोजशाला एक प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र था जहां लंबे समय से धार्मिक परंपराएं जुड़ी रही हैं। उन्होंने समाज से इस निर्णय को स्वीकार करने की अपील की और इसे ऐतिहासिक न्याय बताया।

याचिकाकर्ताओं और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में बढ़ी बहस

याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि लंबे संघर्ष के बाद सत्य सामने आया है। उन्होंने दावा किया कि ऐतिहासिक परिस्थितियों में यहां नमाज की शुरुआत हुई थी लेकिन अब न्यायिक निर्णय से स्थिति स्पष्ट हुई है। वहीं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मामले में अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है क्योंकि यह एएसआई संरक्षित स्थल है। उन्होंने कहा कि ऐसे कई अन्य धार्मिक विवाद भी पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं इसलिए अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय पर निर्भर करेगा।

ओवैसी की प्रतिक्रिया और कानूनी विवाद की नई दिशा

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्थल पिछले कई सौ वर्षों से मस्जिद के रूप में उपयोग होता रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस फैसले की समीक्षा करेगा। ओवैसी ने यह भी कहा कि 1935 के राजपत्र और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसे मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है। उन्होंने पूजा स्थल अधिनियम 1991 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदला नहीं जा सकता और यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में निर्णायक चरण में पहुंच सकता है।

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