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भवानिपुर विधानसभा सीट: ममता बनर्जी की राजनीति का गढ़ और कांग्रेस से TMC तक का सफर

By Neha
On: Monday, March 23, 2026 2:46 PM
भवानिपुर विधानसभा सीट: ममता बनर्जी की राजनीति का गढ़ और कांग्रेस से TMC तक का सफर
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानिपुर विधानसभा क्षेत्र का विशेष महत्व है। यह सीट राज्य के राजनीतिक बदलाव का एक सजीव आईना है। देश की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का प्रभुत्व, फिर लेफ्ट फ्रंट का उदय और अंततः तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का संपूर्ण नियंत्रण—इस क्षेत्र की यात्रा इन बदलावों को बयां करती है। भवानिपुर को आज के समय में टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, लेकिन यह हमेशा ऐसा मजबूत क्षेत्र नहीं रहा।

ममता बनर्जी का भवानिपुर पर दृष्टिकोण

टीएमसी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में पार्टी के नेताओं को सतर्क रहने की हिदायत दी। ममता ने कहा कि स्थिति अब नियंत्रण से बाहर है। उन्होंने तीन दिनों में 50 पदाधिकारियों को हटाए जाने की जानकारी दी और कई पार्षदों के कृत्यों और प्रदर्शन से असंतोष व्यक्त किया। भवानिपुर के अपने क्षेत्र के बारे में ममता ने कहा, “भवानिपुर के सभी लोग मुझे जानते हैं। घर बदलने की चर्चा के बावजूद मैं कभी भवानिपुर नहीं छोड़ी। मेरी माँ ने मुझे कभी भी यहाँ से जाने की अनुमति नहीं दी।”

भवानिपुर विधानसभा सीट का ऐतिहासिक महत्व

पीटीआई के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक यह दक्षिण कोलकाता की सीट कांग्रेस का गढ़ रही और कई प्रभावशाली नेताओं का गृह क्षेत्र भी रही। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने यहां कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में और बाद में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अन्य कांग्रेस stalwarts जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस सीट से प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानिपुर कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण शहरी गढ़ बन गया।

भवानिपुर पर वर्षों तक कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। 1969 में लेफ्ट फ्रंट ने केवल थोड़े समय के लिए इस सीट पर कब्जा किया। उस समय इसे कलिघाट विधानसभा क्षेत्र के रूप में पुनर्नामित किया गया था। 1953 में, सीपीआई(एम) नेता साधन गुप्ता इस क्षेत्र से भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने। भवानिपुर का राजनीतिक सफर 1972 में अचानक बदल गया, जब परिसीमन के बाद यह क्षेत्र निर्वाचन मानचित्र से गायब हो गया। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृति में रही। 2011 में इसे पुनः अस्तित्व मिला। इस दौरान बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव आए; इसी वर्ष लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का युग शुरू हुआ।

पुनरुद्धार और ममता का युग

2011 के परिसीमन के बाद भवानिपुर की सीट ने बंगाल की राजनीति में नया रंग भर दिया। ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने इस क्षेत्र को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लिया। यह सीट अब केवल चुनावी मानचित्र का हिस्सा नहीं बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान का प्रतीक भी बन गई है। आज भवानिपुर का इतिहास, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और ममता की छवि इस क्षेत्र को पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक बनाती है।

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