एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। यह मामला वीडियो शूट में सांप के जहर के इस्तेमाल और रेव पार्टियों में ड्रग्स सेवन के आरोपों से जुड़ा था। कोर्ट ने साफ कहा कि यह FIR सीमित कानूनी आधारों पर टिक नहीं पाती है। इस फैसले ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है और एल्विश यादव को फिलहाल बड़ी राहत मिल गई है।

कोर्ट ने किन कानूनी पहलुओं पर किया विचार
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केवल दो कानूनी सवालों पर ध्यान केंद्रित किया। पहला सवाल NDPS एक्ट की धारा 2(23) की लागू होने की स्थिति थी। दूसरा सवाल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 55 के तहत कार्यवाही की वैधता का था। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह केवल इन सीमित कानूनी मुद्दों पर फैसला दे रही है। इस दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि वह मामले के तथ्यों की गहराई में जाकर आरोपों की सच्चाई पर निर्णय नहीं कर रही है।
बरामदगी और NDPS एक्ट पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट के सामने यह दलील रखी गई कि सह आरोपी से जो पदार्थ मिला वह NDPS एक्ट की सूची में शामिल नहीं था। अदालत ने इस बात को स्वीकार किया कि कथित साइकोट्रॉपिक पदार्थ वैधानिक दायरे में नहीं आता है। साथ ही यह भी सामने आया कि एल्विश यादव से कोई सीधी बरामदगी नहीं हुई थी। चार्जशीट में सिर्फ यह कहा गया था कि उन्होंने किसी सहयोगी के जरिए ऑर्डर दिए थे। इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि NDPS एक्ट का लागू होना कानूनी रूप से सही नहीं था।
FIR की वैधता पर सवाल और अंतिम फैसला
वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत अदालत ने कहा कि मुकदमा केवल अधिकृत अधिकारी की शिकायत पर ही शुरू हो सकता है। इस मामले में शिकायत एक NGO से जुड़े व्यक्ति द्वारा दी गई थी जो विधिक रूप से सक्षम प्राधिकारी नहीं था। कोर्ट ने इस आधार पर FIR को अवैध माना। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि IPC के तहत लगाए गए आरोप भी स्वतंत्र रूप से टिकाऊ नहीं हैं। इन सभी कारणों से कोर्ट ने पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसने आरोपों की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।







