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2000 करोड़ संपत्ति विवाद में नया मोड़ ट्रायल कोर्ट आदेश पर ED की चुनौती

By Neha
On: Monday, April 20, 2026 8:49 AM
2000 करोड़ संपत्ति विवाद में नया मोड़ ट्रायल कोर्ट आदेश पर ED की चुनौती
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नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर आज दिल्ली हाई कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। यह मामला उस ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है जिसमें ED की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया गया था। सुनवाई न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के समक्ष होगी। यह मामला लंबे समय से चर्चा में है और अब अदालत के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि यह आगे की कानूनी प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पहले ही जारी हो चुका है नोटिस

इस मामले में पहले ही दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी किया था। यह नोटिस 22 दिसंबर को जारी किया गया था। इसके साथ ही ED की उस अर्जी पर भी नोटिस दिया गया जिसमें 16 दिसंबर 2025 के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी। अदालत ने सभी पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है ताकि मामले की सुनवाई आगे बढ़ सके। यह प्रक्रिया इस बात को दर्शाती है कि मामला अब उच्च न्यायिक स्तर पर गंभीर रूप से विचाराधीन है।

ED के आरोप और 2000 करोड़ की संपत्ति विवाद

प्रवर्तन निदेशालय का आरोप है कि यंग इंडियन कंपनी के जरिए लगभग 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों पर कथित रूप से कब्जा किया गया जो एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड यानी AJL की थीं। AJL ही नेशनल हेराल्ड अखबार प्रकाशित करता था। एजेंसी का कहना है कि यंग इंडियन में गांधी परिवार की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी थी और 90 करोड़ रुपये के कर्ज के बदले यह संपत्तियां अनुचित तरीके से हासिल की गईं। इस मामले में सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और सुनील भंडारी जैसे नाम भी शामिल हैं जिन्हें पक्षकार बनाया गया है।

ट्रायल कोर्ट का आदेश और कानूनी बहस का केंद्र

ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि धन शोधन निवारण अधिनियम यानी PMLA के तहत जांच और अभियोजन तब तक मान्य नहीं हो सकता जब तक किसी शेड्यूल्ड अपराध के लिए FIR दर्ज न हो। अदालत ने यह भी कहा कि यह जांच एक निजी शिकायत पर आधारित थी जिसे भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दायर किया था और इस आधार पर FIR दर्ज नहीं की गई थी। वहीं ED का तर्क है कि सक्षम अदालत द्वारा निजी शिकायत पर लिया गया संज्ञान भी कानूनी रूप से मजबूत आधार होता है। अब दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि बिना FIR के ऐसे मामलों में जांच और अभियोजन कितना वैध माना जाएगा और यह निर्णय भविष्य के कई मामलों पर भी असर डाल सकता है।

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