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विशेष लेख: नवभारत के निर्माण में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का योगदान

On: Wednesday, April 29, 2026 10:46 PM
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प्रवीण टाके (उपनिदेशक, सूचना)
भारतीय संत परंपरा केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने समाज को बदलने में भी बड़ी भूमिका निभाई है। इस गौरवशाली परंपरा में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 30 अप्रैल को उनकी जयंती है, जिसे उनकी इच्छानुसार ‘ग्राम जयंती उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है।
भजन से राष्ट्र निर्माण तक का सफर
तुकडोजी महाराज का जन्म 30 अप्रैल 1909 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के यावली गाँव में हुआ था। आजादी के बाद एक सशक्त और समृद्ध भारत बनाने का जो सपना हमारे महापुरुषों ने देखा था, महाराज उसे जमीन पर उतारने वाले प्रमुख नायक थे। उन्होंने केवल मंदिर-मठों में बैठकर उपदेश नहीं दिए, बल्कि भजन और कीर्तन को जन-जागरण का हथियार बनाया। यही कारण है कि उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ की उपाधि से नवाजा गया।

ग्रामगीता: ग्रामीण विकास का मूलमंत्र

महाराज का मानना था कि “गाँव ही विश्व का नक्शा है और गाँवों से ही देश की परीक्षा होती है।” उन्होंने अपने अमर ग्रंथ ‘ग्रामगीता’ में गाँव के विकास का पूरा खाका पेश किया। स्वच्छता, शिक्षा, आपसी सहयोग और आत्मनिर्भरता जैसे जो विचार आज हम सरकारी योजनाओं में देखते हैं, महाराज ने दशकों पहले उन्हें अपनी कविताओं में पिरो दिया था। आज की ‘पंचायत राज’ व्यवस्था को मजबूत करने में उनके विचारों का बड़ा योगदान है।

आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी भूमिका
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनके भजनों ने युवाओं में जोश भर दिया था। उनके शब्द अंग्रेजों की लाठियों से ज्यादा शक्तिशाली थे। “पत्थर सारे बम बनेंगे, भक्त बनेगी सेना…” जैसे नारों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वे महात्मा गांधी और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने छुआछूत जैसी बुराइयों के खिलाफ जीवनभर संघर्ष किया।
विश्व मंच पर भारतीय संस्कृति का परचम
1955 में जापान में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में महाराज ने “वसुधैव कुटुंबकम” (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) का संदेश देकर दुनिया को अचंभित कर दिया था। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उनके खंजरी भजनों के इतने मुरीद थे कि उन्होंने महाराज को विशेष रूप से राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया था।
मोजरी: सेवा का जीवंत केंद्र
अमरावती का ‘गुरुकुंज आश्रम’ आज भी उनके विचारों की मशाल जलाए हुए है। यह खुशी की बात है कि आश्रम के महासचिव *जनार्दन पंत बोथे* को 26 जनवरी 2026 को *’पद्मश्री’* पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जो राष्ट्रसंत के कार्यों की महत्ता को दर्शाता है।
आज के दौर में प्रासंगिकता
आज जब समाज जाति और धर्म के नाम पर बंट रहा है, तब तुकडोजी महाराज का संदेश— “सबके लिए खुला है मंदिर यह हमारा”—सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने सिखाया कि असली पूजा वह है जो दुखी और जरूरतमंद की सेवा में की जाए।
उनकी जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए रास्ते पर चलकर एक स्वच्छ, शिक्षित और संगठित समाज का निर्माण करें।

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