डहाणू (पालघर) में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर स्वास्थ्य व्यवस्था की शर्मनाक तस्वीर सामने आई। वडकुन क्षेत्र की 25 वर्षीय गर्भवती महिला दर्शना सर्जन माच्छी प्रसव पीड़ा के दौरान 6 घंटे तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करती रहीं। प्रसव के समय अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता और आपातकालीन एम्बुलेंस की कमी ने परिवार को आधी रात को सड़क पर जंग लड़ने पर मजबूर कर दिया। यह घटना न केवल अस्पताल की व्यवस्था की पोल खोलती है बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।

प्रसव के दौरान पीड़ा और आधी रात की भटकन
दर्शना माच्छी ने गर्भावस्था के पूरे 9 महीने डहाणू उप-जिला अस्पताल में नियमित जांच करवाई थी। लेकिन प्रसव के समय डॉक्टरों ने विशेषज्ञ की कमी का हवाला देते हुए सिजेरियन के लिए गुजरात जाने की सलाह दी। परिवार ने आपातकालीन ‘108’ सेवा से संपर्क किया, लेकिन एम्बुलेंस पहुँचने में दो घंटे से अधिक का समय बताया गया। महिला की असहनीय पीड़ा को देखते हुए परिवार ने ऑटो-रिक्शे के जरिए निजी अस्पतालों की खोज शुरू की। शहर के दो निजी अस्पतालों ने डॉक्टर न होने के कारण केस लेने से इंकार किया, और आखिरकार तड़के 3 बजे एक निजी अस्पताल ने महिला को भर्ती किया। सुबह 7 बजे स्वस्थ पुत्र का जन्म हुआ, लेकिन करीब 6 घंटे तक महिला जीवन-मरण की लड़ाई लड़ती रहीं।

प्रशासन की गंभीर विफलता और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी
पालघर जिले के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 24 घंटे उपलब्धता न होना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। हाल ही में विधायक विनोद निकोले ने विधानसभा सत्र में स्वास्थ्य कर्मियों की रिक्तियों को भरने की मांग की थी, लेकिन धरातल पर स्थिति भयावह बनी हुई है। गंभीर उपचार के लिए अभी भी ग्रामीण लोग पड़ोसी राज्य गुजरात या महंगे निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। यह दर्शाता है कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी जारी है और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियों के कारण माताओं को सुरक्षित प्रसव के लिए जंग लड़नी पड़ रही है।
आधिकारिक प्रतिक्रिया और शासन के लिए संदेश
डहाणू उप-जिला अस्पताल के जिला शल्य चिकित्सक डॉ. रामदास मराड ने कहा कि इस घटना की गंभीरता से जांच शुरू कर दी गई है। दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि, सोशल मीडिया पर महिला दिवस की शुभकामनाओं के बीच दर्शना माच्छी जैसी प्रसूताओं की चीखें दब रही हैं। यह घटना शासन-प्रशासन के लिए संदेश है कि जब तक बुनियादी स्वास्थ्य ढांचा मजबूत नहीं होगा, सुरक्षित मातृत्व केवल कागजों तक सीमित रहेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन माताओं को सुरक्षित प्रसव के लिए सड़क पर संघर्ष करने से कैसे बचाएगा।








