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तारपा की संस्कृति से पालघर जिले ने संजोई परंपरा |

On: Monday, January 26, 2026 6:34 PM
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वरिष्ठ आदिवासी तारपा वादक भिकल्या धिंडा को पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा, जिलाधिकारी डॉ. इंदु रानी जाखड़ ने दी शुभकामनाएं

पालघर, 25 जनवरी :
आदिवासी लोककला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में आजीवन योगदान देने वाले पालघर जिले के वाळवंडा निवासी वरिष्ठ आदिवासी तारपा वादक भिकल्या धिंडा को केंद्र सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है। इस सम्मान की घोषणा से धिंडा परिवार सहित संपूर्ण पालघर जिले और आदिवासी समाज में हर्ष का वातावरण व्याप्त है।

92 वर्षीय भिकल्या धिंडा पिछले आठ दशकों से अधिक समय से तारपा वादन की परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। उन्होंने मात्र दस वर्ष की आयु में तारपा वादन प्रारंभ किया था। यह कला उनके परिवार में लगभग 400 वर्षों से चली आ रही वंशानुगत परंपरा का हिस्सा है। आदिवासी संस्कृति का प्रतीक माने जाने वाले तारपा वाद्य को उन्होंने केवल वादन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर संरक्षित और संवर्धित किया।

देवपूजा, धार्मिक अनुष्ठान, उत्सव, पर्व-त्योहार एवं सामाजिक कार्यक्रमों में तारपा के नाद के माध्यम से उन्होंने आदिवासी जीवनशैली, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया। उत्कृष्ट तारपा वादक के रूप में उनकी पहचान राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक स्थापित हुई है।

भिकल्या धिंडा ने अपने पिता से प्राप्त इस पारंपरिक कला को तारपा वाद्य के निर्माण और वादन—दोनों क्षेत्रों में विकसित किया। लगभग दस फुट लंबे तारपा वाद्य का वादन उनकी विशिष्ट पहचान मानी जाती है। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रस्तुतियां देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। साथ ही, अनेक युवाओं को तारपा वादन का प्रशिक्षण देकर इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित किया है। वे स्वयं तारपा वाद्य का निर्माण कर अपनी आजीविका भी चलाते हैं।

पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा के पश्चात जिलाधिकारी डॉ. इंदु रानी जाखड़ ने भिकल्या धिंडा से भेंट कर उनका अभिनंदन किया और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि, “आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन हेतु भिकल्या धिंडा द्वारा किया गया आजीवन समर्पण पूरे पालघर जिले के लिए गौरव का विषय है। यह सम्मान जिले की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाला है।”

आदिवासी लोककला की जीवंत परंपरा को संजोते हुए निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले भिकल्या धिंडा को पद्मश्री पुरस्कार मिलने से तारपा वाद्य और आदिवासी संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान प्राप्त हुई है। इस उपलब्धि पर जिले भर से उनके प्रति शुभेच्छाओं और बधाइयों का सिलसिला जारी है।

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