नई दिल्ली |
भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति वर्ष 2026 में 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। इसका मुख्य कारण 14 जनवरी को एकादशी तिथि का होना है, जिसमें शास्त्रसम्मत रूप से चावल एवं चावल से बनी वस्तुओं का सेवन, दान और उपयोग वर्जित माना गया है। चूंकि मकर संक्रांति पर खिचड़ी एवं अन्नदान का विशेष धार्मिक महत्व है, इसलिए पंचांगकारों और धर्मशास्त्रियों के अनुसार इस वर्ष पर्व को द्वादशी तिथि अर्थात 15 जनवरी को मनाना अधिक शुभ, फलदायी और शास्त्रसम्मत है।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार तिथि निर्धारण
धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी तिथि में अन्न ग्रहण एवं अन्नदान निषिद्ध है। मकर संक्रांति पर परंपरागत रूप से खिचड़ी, चावल, तिल और गुड़ का दान किया जाता है। ऐसे में 14 जनवरी को एकादशी होने के कारण दान-पुण्य की पूर्णता बाधित होती है।
धर्माचार्यों के अनुसार, द्वादशी तिथि में किया गया स्नान-दान और अन्नदान पूर्ण पुण्यफल प्रदान करता है, इसी कारण देश के अधिकांश क्षेत्रों में मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जा रही है।
खगोलीय एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति का संबंध सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश से है। यह परिवर्तन पृथ्वी की वार्षिक गति का स्वाभाविक परिणाम है। इसी समय से सूर्य उत्तरायण होता है, जिससे दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं।
उत्तरायण काल को स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के लिए अनुकूल माना गया है। सूर्य की किरणें अधिक प्रभावी होकर मानव शरीर में विटामिन-D के अवशोषण, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मौसमी संतुलन में सहायक होती हैं।
कृषि और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
मकर संक्रांति नई फसल के आगमन का प्रतीक पर्व है। यह किसानों द्वारा प्रकृति और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। तिल-गुड़ का सेवन और दान सामाजिक समरसता, मधुर संबंध और ऊर्जा संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
देश के विभिन्न भागों में यह पर्व पोंगल, माघ बिहू, उतरायण और खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है।
15 जनवरी को किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान
प्रातःकाल पवित्र नदी या जलाशय में स्नान
सूर्य देव को अर्घ्य अर्पण
तिल, गुड़, चावल, दाल, वस्त्र और कंबल का दान
खिचड़ी का भोग एवं सामूहिक वितरण
सामाजिक सौहार्द और सद्भाव का संदेश
मीडिया विश्लेषण———–
वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का 15 जनवरी को मनाया जाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत, तिथि-आधारित और वैज्ञानिक दृष्टि से संगत है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में धर्म, विज्ञान, प्रकृति और समाज के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और लोककल्याण का संदेश देता है।









