राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है बल्कि करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का केंद्र भी है। 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यहां श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। देश और विदेश से आने वाले भक्त अपनी श्रद्धा के प्रतीक के रूप में दान अर्पित करते हैं। ऐसे में दान राशि में कथित अनियमितताओं की खबरें स्वाभाविक रूप से लोगों की चिंता बढ़ा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंची मांग
अधिवक्ता अनूप अवस्थी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। उनका कहना है कि यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी का मुद्दा नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के भरोसे का प्रश्न है। उन्होंने अदालत की निगरानी में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है ताकि किसी भी तरह की शंका को दूर किया जा सके।
आरोपों ने बढ़ाई गंभीरता
पत्र में दावा किया गया है कि मंदिर के दान से जुड़े मामलों में वित्तीय हेराफेरी और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। कुछ पूर्व कर्मचारियों और संदिग्ध व्यक्तियों की आय से अधिक संपत्ति होने की चर्चाएं भी सामने आई हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही संभव होगी। फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है।
केवल प्रशासनिक जांच पर क्यों उठ रहे सवाल
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतने संवेदनशील मामले में सिर्फ प्रशासनिक स्तर की जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। उनका कहना है कि अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है जिससे लोगों के बीच कई तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं। यही वजह है कि सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की जा रही है।
पारदर्शिता ही सबसे बड़ा उत्तर
राम मंदिर ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद हुआ था। इसलिए इसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। धार्मिक संस्थानों में जनता का विश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी होता है और उसे बनाए रखने के लिए हर स्तर पर जवाबदेही आवश्यक है।








