लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर देश में एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। संविधान के अनुसार लोकसभा सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 81 और 82 में स्पष्ट प्रावधान है कि हर जनगणना के बाद सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। लेकिन समय के साथ इस मुद्दे पर राजनीतिक और क्षेत्रीय असहमति भी बढ़ी है। कई राजनीतिक दल और राज्य यह तर्क दे रहे हैं कि केवल जनसंख्या को आधार बनाना उचित नहीं है क्योंकि सभी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर समान नहीं रही है। इस वजह से परिसीमन को लेकर एक नई बहस ने जन्म ले लिया है जिसमें संविधान की व्याख्या और व्यावहारिक जरूरतें आमने सामने आ गई हैं।

जनसंख्या को आधार मानने पर विधि विशेषज्ञों की राय
अधिकांश विधि विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन का मूल आधार जनसंख्या ही होना चाहिए। उनका कहना है कि संविधान में स्पष्ट रूप से यही व्यवस्था दी गई है और इसमें किसी प्रकार की व्याख्या की गुंजाइश सीमित है। कई विशेषज्ञों का तर्क है कि हर वोट का मूल्य समान होना चाहिए लेकिन जनसंख्या के असंतुलन के कारण प्रतिनिधित्व में अंतर आ जाता है। इससे कुछ राज्यों में सांसदों पर जनसंख्या का दबाव अधिक होता है जबकि कुछ में कम। पूर्व न्यायाधीशों की राय है कि यदि इस व्यवस्था में बदलाव करना है तो इसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक होगा अन्यथा मौजूदा व्यवस्था से अलग नहीं जाया जा सकता। उनके अनुसार परिसीमन को रोकना या बदलना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत होगा।
वैकल्पिक आधारों की मांग और बदलते तर्क
दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ और न्यायिक पृष्ठभूमि से जुड़े लोग यह मानते हैं कि केवल जनसंख्या को आधार बनाना अब पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि समय के साथ सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं इसलिए परिसीमन में अन्य मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। कुछ पूर्व मुख्य न्यायाधीशों का मत है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है उन्हें सीटों के नुकसान का सामना नहीं करना चाहिए। वहीं कुछ वरिष्ठ वकीलों का सुझाव है कि आर्थिक योगदान और जीडीपी जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा जा सकता है। हालांकि इस विचार पर भी असहमति है क्योंकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक आधार पर प्रतिनिधित्व तय करना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है।
लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन की चुनौती
इस पूरी बहस में सबसे बड़ा सवाल लोकतंत्र और समान प्रतिनिधित्व के संतुलन का है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रतिनिधित्व को आर्थिक स्थिति या अन्य कारकों से जोड़ा गया तो यह असमानता पैदा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि केवल आर्थिक योगदान को आधार बनाया गया तो अधिक कमाई करने वाले क्षेत्र अधिक शक्तिशाली हो जाएंगे और गरीब क्षेत्रों की आवाज कमजोर पड़ सकती है। इसी तरह यह भी तर्क दिया जा रहा है कि जैसे चुनाव में शिक्षा या आर्थिक स्थिति को आधार नहीं बनाया जाता वैसे ही परिसीमन में भी केवल जनसंख्या को ही प्राथमिक आधार माना जाना चाहिए। हालांकि संघीय ढांचे में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देने की बात भी उठती रही है जिससे यह मुद्दा और जटिल हो जाता है। कुल मिलाकर परिसीमन का यह विवाद आने वाले समय में राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर एक बड़ा बहस का विषय बना रहेगा।








