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सावधान! यूपी में ‘फर्जी FIR’ पर सख्ती: झूठे मुकदमेबाजों के खिलाफ होगा सीधा एक्शन

By Neha
On: Saturday, March 28, 2026 9:32 AM
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उत्तर प्रदेश में अब झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती के बाद राज्य पुलिस ने बड़ा कदम उठाया है। अब यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठी FIR दर्ज कराता है, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई तय होगी। इस फैसले का उद्देश्य न्याय प्रणाली का दुरुपयोग रोकना और निर्दोष लोगों को झूठे मामलों से बचाना है।

पहले क्या होता था?
अब तक अगर पुलिस जांच में कोई मामला झूठा पाया जाता था, तो ‘फाइनल रिपोर्ट’ (FR) लगाकर केस को बंद कर दिया जाता था। लेकिन अब इस प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया गया है। नए निर्देशों के मुताबिक, यदि यह साबित हो जाए कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर गलत जानकारी देकर FIR दर्ज कराई, तो पुलिस को उसके खिलाफ ‘परिवाद’ (Complaint Case) दाखिल करना अनिवार्य होगा।

कानूनी शिकंजा होगा और कड़ा
नई व्यवस्था के तहत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी। धारा 212 और 217 (पूर्व में IPC 177 व 182) के तहत गलत सूचना देना अपराध माना जाएगा। इतना ही नहीं, जांच अधिकारी को 60 दिनों के भीतर कोर्ट में मामला पेश करना होगा। साथ ही, झूठे गवाहों को भी अब बख्शा नहीं जाएगा।

हाईकोर्ट की फटकार के बाद एक्शन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि कानून का इस्तेमाल निजी बदले के लिए नहीं होना चाहिए। इसी के बाद पुलिस महानिदेशक (DGP) ने राज्यभर में सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

प्रशासनिक स्तर पर भी कड़ाई
नए आदेश के तहत हर थाने में झूठी FIR का अलग रजिस्टर बनाया जाएगा। क्षेत्राधिकारी (CO) से लेकर एडीजी (ADG) स्तर तक हर महीने इन मामलों की समीक्षा होगी। यदि कोई पुलिस अधिकारी कार्रवाई में लापरवाही करता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, पुलिस को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे ‘साक्ष्य के अभाव’ और ‘झूठे आरोप’ के बीच अंतर को सावधानी से समझें, ताकि असली पीड़ितों को कोई नुकसान न हो।

न्याय व्यवस्था में सुधार की दिशा
उत्तर प्रदेश में लंबे समय से व्यक्तिगत दुश्मनी या जमीन विवाद के चलते झूठे केस दर्ज कराने की प्रवृत्ति देखी जाती रही है। इससे निर्दोष लोगों का जीवन प्रभावित होता है और अदालतों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है। ऐसे में सरकार का यह कदम न्याय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून का सही और निष्पक्ष उपयोग बेहद जरूरी है, ताकि यह निर्दोषों की सुरक्षा का साधन बने, न कि किसी के खिलाफ नया हथियार।

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