उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का मामला अब कानूनी विवाद का रूप ले चुका है। राज्य सरकार के इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी गई है। यह याचिका ओमप्रकाश प्रजापति द्वारा दायर की गई है, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मामले को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने बुधवार यानी 3 जून को सरकार से विस्तृत पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस कदम के बाद पूरे प्रदेश की पंचायत व्यवस्था पर बहस तेज हो गई है और कानूनी विशेषज्ञ भी इस मामले को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने आदेश को कानून के खिलाफ बताया
याचिकाकर्ता ओमप्रकाश प्रजापति का कहना है कि सरकार का यह आदेश पंचायती राज अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ है। उनका तर्क है कि कानून के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तारीख से अधिकतम पांच वर्ष तक ही सीमित होता है। ऐसे में जब कार्यकाल समाप्त हो चुका है तो उन्हीं प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करना अप्रत्यक्ष रूप से उनके कार्यकाल को बढ़ाने जैसा है, जो पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इस आदेश को तत्काल रद्द किया जाए और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए।
सरकारी आदेश और पंचायत संचालन पर स्थिति स्पष्ट
सरकार ने अपने आदेश में कहा है कि पंचायत चुनावों में देरी और पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया लंबी होने के कारण यह निर्णय लेना पड़ा है। इसके तहत प्रदेश की 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों में निवर्तमान प्रधानों को अगले छह महीनों के लिए प्रशासक नियुक्त किया गया है। सरकार का कहना है कि इससे सफाई, पेयजल, मनरेगा और सड़क मरम्मत जैसे विकास कार्य बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे। हालांकि आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रशासक के रूप में प्रधान कोई बड़ा या नीति संबंधी निर्णय नहीं ले सकेंगे और महत्वपूर्ण मामलों में जिला प्रशासन की अनुमति अनिवार्य होगी।
कोर्ट की सख्ती और आगे की सुनवाई पर नजर
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सरकारी वकील को निर्देश दिया है कि वे राज्य सरकार से आवश्यक निर्देश लेकर अगली सुनवाई में पक्ष प्रस्तुत करें। याचिकाकर्ता के वकील अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया कि अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 जून को तय की है। इस फैसले के बाद अब सभी की नजर कोर्ट के रुख पर टिकी है, क्योंकि यह मामला यूपी की पंचायत व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर बड़ा असर डाल सकता है।








