पालघर | खबरदीप जनमंच
आर्थिक विवशताओं के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करने वाले निर्माण श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा अक्सर सबसे बड़ा शिकार बनती है। ऐसे ही बच्चों के भविष्य को अंधकार से बाहर निकालने की दिशा में पालघर जिले में एक सराहनीय और संवेदनशील पहल सामने आई है, जिसने शिक्षा के अधिकार को जमीनी स्तर पर सशक्त किया है।
पालघर जिले में कार्यरत स्थलांतरित निर्माण श्रमिकों के 14 बच्चों को जिला परिषद विद्यालय, आनंदाश्रम में औपचारिक रूप से प्रवेश दिलाकर उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा गया है। केवल प्रवेश ही नहीं, बल्कि इन विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें और गणवेश भी उपलब्ध कराए गए, ताकि आर्थिक बाधाएँ उनकी पढ़ाई में अवरोध न बनें।
प्रशासन, सामाजिक संस्था और शिक्षा विभाग का समन्वय
इस पहल की विशेषता यह रही कि इसे केवल औपचारिक आदेश तक सीमित नहीं रखा गया। जिला कलेक्टर कार्यालय, स्पर्श फाउंडेशन और शिक्षा विभाग, पालघर ने संयुक्त रूप से त्वरित सर्वेक्षण कर उन बच्चों की पहचान की, जो पलायन के कारण विद्यालय से बाहर हो गए थे। यह समन्वय दर्शाता है कि यदि प्रशासन और समाज एक साथ काम करें, तो जटिल सामाजिक समस्याओं का समाधान संभव है।
सम्मान के साथ स्वागत
कार्यक्रम के दौरान जिला कलेक्टर डॉ. इंदू रानी जाखड़ एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज रानडे के करकमलों से विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें और गणवेश वितरित किए गए। यह केवल सामग्री वितरण नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति बच्चों और उनके अभिभावकों में आत्मविश्वास और सम्मान का भाव जगाने वाला क्षण था।
व्यापक सहभागिता
इस अवसर पर शिक्षणाधिकारी (प्राथमिक) सोनाली मातकर, खंड शिक्षा अधिकारी निमिष मोहिते, बीट विस्तार अधिकारी नीलम पष्टे, केंद्र प्रमुख विनोद पाटिल, स्पर्श फाउंडेशन के पदाधिकारी, निर्माण श्रमिक अभिभावक और नवप्रवेशित विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ, जिसने शिक्षा को लेकर सकारात्मक संदेश दिया।
केवल प्रवेश नहीं, भविष्य की नींव
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल केवल 14 बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक मॉडल के रूप में उभर सकती है। यदि पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों को समय रहते नजदीकी सरकारी विद्यालयों से जोड़ा जाए, तो बाल श्रम, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन जैसी समस्याओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।






